College History

वाराणसी को ‘सर्विध्या की राजधानी ‘ कहा गया है | अनादिकाल से देश-विदेश से विद्यार्थी यहाँ विद्या अर्जन करने आते रहे है | राजा दिवोदास का आयुविज्ञान विधापीठ यहाँ था | तक्षशीला और काशी के विद्यालयों के बीच शिक्षकों –विद्यार्थी का आदान प्रदान होता था | गौतम बुद्ध से लेकर स्वामी दयानंद तक भारत के विभिन्न सम्प्रदायों के प्रवर्तक और दर्शनों के आचार्य अपने मत पर प्रमाणिकता की मुहर लगवाने काशी आते रहे है | ‘उच्च विधाध्ययन’ का अर्थ ही हो गया था काशी जाना | एक विदेशी विद्वान ने लिखा है कि यहाँ हर घर में पंडित और उसकी पाठशाला है और इस प्रकार पूरा नगर ही विश्वविध्यालय है | ऐसी विध्या की नगरी में बादशाह औरंगजेब ने फरमान जारी किया कि “ तमाम मंदिर और पाठशालाएँ गिरा दे, शास्त्रों का पठन-पाठन और मूर्तिपूजा बंद कर दे |” सितम्बर १६६९ इ० में विश्वनाथ मंदिर और बिंदुमाधव मंदिर गिरा दिये गये | पंचगंगा घाट पर बिन्दुमाधव मंदिर के पास जयपुर नरेश ने राम मंदिर, कन्गंवाली हवेली और एक पाठ शाला स्थापित की थी | तावेनिर्ये नामक यात्री ने इस पाठशाला का विशद वर्णन किया है (१६६५ इo)| दुसरे यात्री बर्नियर ने १६६० ईo के बनारस की शिक्षा संस्थाओ पर प्रकाश डाला है, किन्तु बादशाही फरमान के बाद पाठशालायें बंद हो गयीं | गुपचुप कुछ पंडित अपने शिष्यों को पढ़ाते लिखाते रहे | सौ वर्ष के अविधा के अन्धकार के बाद पुनः ज्ञान का सूर्योदय हुआ | उस समय काशी पर इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार हो चुका था | कंपनी के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने काशी के राजा चेतसिंह को अपदस्थ करके नगर पर कंपनी का शासन स्थापित किया था ( १७८१ ईo ) | सन १७८७ ईo में डंकन बनारस के रेजिडेंट बनकर काशी आये | डंकन ने बनारस की शासन-व्यवस्था में अनेक सुधार किये | सहज ही था वह शिक्षा की बात भी सोचता |

जैसा कि ऊपर कहा गया कि अठारवीं सदीं के अंत में मुग़ल साम्राज्य का अवसान हो गया और ब्रिटिश सत्ता धीरे-धीरे काबिज हो रही थी | अंग्रेज व्यापारी थे, अस्तु उनमें इस्लामी शासको की धार्मिक रुढिवादिता नहीं थी | वे ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार तो करना चाहते थे पर तलवार के दम पर नहीं | दो बाते कम्पनी के शासको के सामने आयीं | एक तो यह कि दीवानी कचहरी में प्रस्तुत वादों में शास्त्रों की व्याख्या करके अंग्रेज न्यायधीश की सहायता करने के लिये संस्कृत पंडितों की आवश्यकता थी,दुसरे संश्कृत की पाठशाला या उर्दू फारसी पढ़ाने के मदरसे खोलने से लोगों में कंपनी की लोकप्रियता बढ़ेगी | साथ ही बनारस में संश्कृत शिक्षा की व्यवस्था करना विशेष महत्व रखता था क्योंकि यह विध्या का केंद्र तो था ही, साथ ही अंग्रजों ने सोचा कि इस राष्ट्र के संश्कृत साहित्य और धर्म, आस्था और विश्वास के इस केंद्र में जहाँ श्रद्धालु नेटिव आते हैं, संरक्षण और संवर्धन करना चाहिए जिनसे लोग कंपनी-सरकार के प्रति अनुग्रहित हों |

अब प्रश्न यह है की बनारस में संस्कृत पाठशालाओं की पुनः स्थापना का विचार पहले किसके मन में आया ? ‘काशी का इतिहास’ में डॉ मोतीचंद्र,जर्नल ऑफ़ गंगानाथ रिसर्च इंस्टिट्यूट-मई १९४४ ईo में एसo एनo सेन के लेख ‘संस्कृत कॉलेज एंड बनारस’ का हवाला देते हुए कहते है की १७९१ ईo में लार्ड मनिगतन के नाम लिखे पत्र में संस्कृत कॉलेज के प्रथम आचार्य काशीनाथ लिखते है कि बनारस संस्कृत कॉलेज चलाने की बात उन्होने ही चलाई थी | दूसरी ओर चार्ल्स बिलकिस को संस्कृत पढाना था और उसे पंडित ढूढ़ने में बड़ी तकलीफ हुई, अतः उसने वारेनहेस्टिंग के समक्ष संस्कृत पाठशाला खोलने का सुझाव रखा | काशीनाथ कलकत्ता जाकर यह प्रस्ताव हेस्टिंग के सामने रखना चाहते थे पर जा ना सके, अतः उन्होनें ये प्रस्ताव बनारस के रेजिडेंट जोनेथन डंकन के समक्ष रखा | अब वास्तविकता क्या है, किसे श्रेय दे, यह निर्णय करना कठिन है |

पहली जनवरी १७९१ ईo को डंकन ने यह प्रस्ताव गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस के सामने रखा | वे यहाँ ‘ भारत का ऑक्सफ़ोर्ड ‘ बनाना चाहते थे | साथ ही डंकन मूल उदेश्य नहीं भूला था | उसने कहा कि इस विद्यालय द्वारा भारतवासिओ को यूरोपीय साहित्य और दर्शन का ज्ञान दिया जा सकेगा क्योंकि उनकी राज में भारतीय साहित्य और दर्शन आदिम अवस्था में है और यहाँ के लोग यूरोप का उच्च ज्ञान प्राप्त कर सहज ही अंग्रेज़ भक्त हो जायेंगे (और उनकी कूटनीति एक हद तक सफल भी रही | उन्होने अच्छी-खासी अंग्लभाक्तो की फौज तैयार भी की |) | साथ ही डंकन ने लिखा की हिन्दू लॉ की मीमांसा के लिए पंडितो की जरुरत है | डंकन ने प्रस्ताव में कहा की कॉलेज की स्थापना के लिये पंडितो और विद्यार्थीयों की सहायता के संस्कृत की हस्तलिखित पुस्तके इकट्ठा की जाएँ, इससे भी हिन्दुओं में अंग्रेजो की ख्याति बढेगी ( और अंग्रेज़ भारत के विद्या-भंडार में घुसकर उसकी सम्पदा देख सकेगा और समझ सकेगा कि उसमें कुछ दम भी है या नहीं | आगे की कूटनीति के लिए यह आवश्यक कदम था |) गवर्नर जनरल ने तुरंत स्वीकार कर लिया और यधपि डंकन ने चौदह हज़ार रुपये सालाना की ही मांग की थी पर कार्नवालिस ने बीस हज़ार रुपए वार्षिक अनुदान की मंजूरी दे दी |

२८ अक्टूबर १७९१ ईo को संस्कृत पाठशाला या गवर्मेंट संस्कृत स्कूल की स्थापना हो गयी | इसके लिए महाराजा महीप नारायण सिंह ( काशी नरेश ) ने प्रचुर धन और भूमि प्रदान की | मिर्ज़ापुर में काशी नरेश की जमींदारी में सतासी परगना की आमदनी कॉलेज चलाने को दी गयी | महाराज ने चौकाघाट स्थित वह भूमि भी दान में दे दी जहा वर्तमान विद्यालय स्थित है |

आरम्भ में मैदागिन तालाब के निकट एक किराये के घर में विद्यालय स्थापित हुआ | सौ रुपए प्रतिमास वेतन पर छह: पंडित और अस्सी रूपए मासिक वेतन पर दो पंडित नियुक्त हुए, नौ विद्यार्थी निशुल्क पढ़ते थे | पंडित काशी नाथ शास्त्री प्रधानाचार्य नियुक्त हुए और इनका वेतन दो सौ रुपए था | विद्यालय में वेद, वेदांत, न्याय, मिमांसा, पुराण,काव्य, ज्योतिष, आयुर्वेद तथा धर्मशास्त्र पढ़ाने की व्यवस्था की गयी | विद्यालय की व्यवस्था रीजेंट स्वयं देखते थे | काशी के विद्वान पंडित अंग्रेजों द्वारा संचालित संस्था में पढ़ाने के लिए तैयार नहीं थे |

सन १७९५ ईo में डंकन बम्बई चले गए और कॉलेज की देखरेख का काम एक समिति के जिम्मे दिया गया जिसमे जीo एफo चेरी, कैप्टेन सैमुऐल डेविस और कप्तान विलफोर्ड नियुक्त हुए | समिति के गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि रीजेंट बनाये गये | इस समिति ने पंडितो का वेतन घटा कर साठ और चालीस रूपए प्रतिमास कर दिया | साठ विद्यार्थियों को एक से दस रूपए तक इस्तिएपेन्द छात्रवृति के मिलते थे | इस समिति के चेरी फारसी के विद्वान थे, डेविस भारतीय ज्योतिष में दखल रखते थे और विल्फोर्ड की संस्कृत अध्यन में रूचि थी | सन १८०१ ईo में चेरी और डेविस के स्थान पर नीव और डीन आ गए | इन लोगो ने काशीनाथ के विरुद्ध रिपोर्ट भेजी और गड़बड़ी के आरोप लगाये | इस कारण काशीनाथ हटायें गये और जटाशंकर पंडित को प्रधानाचार्य बनाया गया | काशीनाथ ने लार्ड मोर्तिन्गन को अर्जी भेज कर दुखड़ा रोया पर असफल रहे | सन १८०४ ईo में समिति के प्रभापति ब्रुकारी ने लिखा की जटाशंकर पाठशाला के आचार्य होने के योग्य नहीं है | सन १८१३ ईo में वीरेश्वर पंडित, शिवराम पंडित,जयराम भट्ट के विरुद्ध शिकायते भेजी गयी | संछेप में, ऐसा प्रतिक होता है की काशीनाथ और उनके साथी गड़बड़ी करते थे और कॉलेज की स्थिति इतनी ख़राब थी की रामप्रसाद तकलिंकार अस्सी वर्ष की अवस्था में नियुक्त हुए थे | विशेश्वर सुब्बशास्त्री और जटाशंकर ने समिति कि छात्रों की वृतिया उन्ही को दी जाएँ जिसे समिति ने अस्वीकार कर दिया | पंडित काशीनाथ के शिष्य योगेश्वर शास्त्री और राजाराम शास्त्री भी विद्यालय में पढ़ते थे | राजाराम के शिष्य बालशास्त्री थे | बाल शास्त्री के चार शिष्य थे- म. म. पo शिव कुमार शास्त्री,म.म. पo गंगाधर शास्त्री, म.म. तात्या शास्त्री और म.म.दामोदर शास्त्री | इन विद्वानों ने कॉलेज की सृवृधि की |

डंकन का ध्येय सफल नहीं हो रहा था, अतः सन १८१२ ईo में कॉलेज की पुनार्योजना हुई जिससे स्थिति कुछ संभली | वृति पाने वाले छात्रों की संख्या साठ निर्धारित कर दी गयी | सुधारो का परिणाम यह हुआ कि १८२३ ईo में विद्यार्थियों की संख्या २०० हो गयी | सन १८२० ईo में कैप्टेन एडवर्ड फेल समिति के सेक्रेटरी और कॉलेज के सुप्रीतेंदंत चुने गए पर १८२४ ईo में उनकी मृत्यु हो गयी |पुनर्योजना में कॉलेज का नाम “बनारस कॉलेज” हो गया |

बिशप हेब्बर ने सन १८२५ ईo में कॉलेज का आँखों देखा हाल लिखा है – “ विद्यालय दो चौक ईमारत में है | यह सर्वदा शिक्षको और विध्यार्तियो से भरा रहता है | विद्यालय में बहुत-सी कक्षाए है जिनमे विध्यार्ती पढ़ना-लिखना,भारतीय गणित, फारसी,हिन्दी कानून,वेद,संस्कृत और ज्योतिष सीखते है | विद्यालय में दो सौ विद्यार्थी है और उनमे बहुत से मुझे पाठ सुनाने आये | दुर्भाग्यवश थोडा ज्योतिष और फारसी के सिवा मै कुछ समझ ना सका | ज्योतिष पंडितो ने हिन्दू ज्योतिष के सिधान्तानुसार बने गोले दिखलाये जिसमे उत्तरी ध्रुव पर सुमेरु पर्वत और दक्षिणी ध्रुव पर कछुवा पर पृथ्वी आश्रित है, थे | पंडित जी ने बतलाया की दक्षिणी गोलार्ध बसने योग्य नहीं है....... इस विद्यालय में अंग्रेजी और यूरोपियन ज्योतिष पढ़ने की कई बार कोशिश की गयी इस पर विद्यालय के विगत प्रधान शिक्षक इसके इसलिए विरोधी थे कि ऐसा करने पर संस्कृत शिक्षा पर व्याघात पहुचने और पंडितो की धार्मिक भावनाओं पर धक्का लगने का दर था | दुसरे दिन विद्यालय का एक छोटा विध्यार्ती मेरे पीछे दौड़ा और हाँथ जोड़ कर अपना पाठ सुनाने की अनुमति चाही .......... श्लोक मेरे सम्बन्ध में थे – शायद यह अभिनन्दन पत्र था |”

( नेरेटिव ऑफ़ अ जर्नी थ्रू दी उपर प्रविसेज ऑफ़ इंडिया –लन्दन,१८६१ ईo- बिशप हेब्बर )

सन १८२९ ईo में कैप्टेन थोसवाई सेक्रेट्री बने और उन्होने सिफारिस की कि संस्कृत के साठ एक अंगरेजी स्कूल भी चलाना चाहिए | जो जून सन १८३० ईo में एंग्लो इंडियन सेमिनरी स्कूल की स्थापना हुई जो सन १८३६ ईo में बनारस गवर्मेंट स्कूल बन गया | सन १८२३ ईo में ‘ जनरल कमिटी ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रक्शन ‘ बना | एंग्लो इंडियन सेमिनरी में गुरुचरण मिश्रा और ईश्वरचंद प्रभृति दो विद्वान अध्यापक थे | सन १८३७ ईo में बनारस गवर्मेंट स्कूल के हेडमास्टर संस्कृत कॉलेज के सुप्रित्तेंदेन्त और स्थानीय शिक्षा समिति के सेक्रेटरी भी होते थे |

अब यह अनुभव किया कि कॉलेज को पूर्णकालिक प्रिंसिपल की आवयश्कता है जो संस्कृत और अंग्रेजी दोनों कॉलेजों का प्रबंध देख सके | यह भी सोचा गया की प्रिंसिपल संस्कृत जानने वाला अंग्रेज़ हो | अतः सन १८४४ ईo में जेo म्योर प्रिंसिपल हुए | वे दो वर्ष तक प्रिंसिपल रहे | स्कूल और संस्कृत कॉलेज मिला कर एक कर दियें गये |

सन १८४६ ईo में डॉ जेo आरo वैलेंटाइन एलएलo डीo प्रिंसिपल बने | वैलेंटाइन संस्कृत के अच्छे विद्वान थे | अपने पन्द्रह वर्ष के कार्यकाल में इन्होने कॉलेज की बड़ी उन्नति की | उनके समक्ष छात्रों को संस्कृत भाषा में इंग्लैंड और भारत का इतिहास, यूरोपियन दर्शन, बेकन का नोवम ओर्गेनम पढ़ाया जाता था | वैलेंटाइन ने अंग्रेज़ विद्वानों के लिए अंग्रेजी भाषा में संस्कृत का व्याकरण, लाघुसिदंत्कौमुदी का अंग्रेजी अनुवाद, संख्या अफारिज्म ऑफ़ कपिल वेदांत सारका अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत किया |

सन १८३५ ईo में विद्यालय के भवन का निर्माण हुआ | मेजर कीटो इस भवन के आर्किटेक्ट थे | गाथिक शैली, पर्पेंदिचुलर स्टाइल, अमुख चुनार के फ्री स्टोन का अंग्रेजी-युग के भारत की सबसे भव्य ईमारत का निर्माण हुआ | इसका केन्द्रीय शिखर ७५ फीट ऊँचा, नेव ६० फीट लम्बा, ३० फूट चौड़ा, ३२ फीट ऊँचा तथा ट्रांस्सेप्त ४० फूट लम्बा, २० फूट चौड़ा, ३२ फूट ऊँचा था | चारो ओर छोटे शिखर थे, दीवाल पर दाताओ के नाम और श्लोक अंकित किये गये |

इसी जमाने में नोर्थवेस्ट प्रोविसेज के लेफ्टिनेंट गवर्नर थोमसन गाजीपुर से पत्थर की लाट उठा लाये जिस पर प्राचीन लिपि में आलेख खुदा था | यह साढ़े इक्कतीस फूट ऊँची लाट कॉलेज के मैदान में स्थापित कर दी गयी | कहते है की जब भवन बन कर तैयार हो गया तो मेजर कीटो को पता चला की भवन में उन्होने चौकी ( प्लिंथ ) रख्ही ही नहीं और वर्षाकाल में वर्षाकाल में पानी घुस आता था | इस चूक पर कीटो को इतनी ग्लानी हुई की उन्होंने आत्महत्या कर ली |

यही एक नार्मल स्कूल भी स्थापित किया गया जहा ग्रामीण स्कूल-अध्यापको का प्रशिक्षण होता था | इसी युग में प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम छिड़ गया और फलतः कंपनी का राज्य समाप्त हो गया | सन १८५७ ईo में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया भारत की महारानी बन गयी | इसके साठ ही गवर्नमेंट स्कूल का नया नामकरण “ क्वीन्स कॉलेज “ हो गया | आरंभ में ये कोलकत्ता विश्वविद्यालय से संबध था और यहाँ पोस्ट ग्रेजुएट ( एमo एo ) तक की शिक्षा होती थी | फिर जब अलाहाबाद विश्वविद्यालय (१८८७) बना तो इसे अलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबध कर दिया गया | लार्ड मैकाले की शिक्षा योजना लागु होने के बाद पारंपरिक संस्कृत शिक्षा में अवरोध आया और इंग्लिश स्कूल की स्थापना का क्रम आरंभ हुआ |

सन १८६१ ईo में आरo टीo एचo ग्रिफित एमo एo ऑक्सफ़ोर्ड के बोडेन संस्कृत-स्कॉलर प्रिंसिपल नियुक्त हुए | ये क्वीन्स कॉलेज के दुसरे यशश्वी प्रिंसिपल बने | ग्रिफित संस्कृतज्ञ तो थे ही, कवि भी थे |इन्होंने वेदों का अंग्रेज़ी अनुवाद किया | इनका बाल्मीकि रामायण का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रसिद्ध है | विद्यालय में जिस स्थल पर ग्रिफित ने रामायण का अनुवाद किया, वहाँ संगमरमर का एक शिलालेख लगा है जिस पर लिखा है –
तमसातट कोकिलेन यचारितम कुजित्भुजिर्त हरे |
तदीहैव निर्वादता सुखं ग्रिफिथे नात्मगीरापियाजियत ||


ग्रिफिथ आजीवन अविवाहित रहे और संस्कृत की सेवा करते रहे | उनका बंगला सुन्दर था और वे अभ्यागतो को बड़े शौक से अपना घर दिखाते | ग्रिफिथ ने ‘ द पंडित ‘ नामक पत्रिका भी प्रकाशित की जो १८६६ ईo से १९१७ ईo तक संस्कृत वाद्य्मय की सेवा करती रही |

ग्रिफिथ के बाद डॉ जीo थीबो पधारे और ये १८७९ ईo से १८८८ ईo तक क्वीन्स- संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल रहे | थीवो जर्मन थे, गणितज्ञ और वेदांत दर्शन के आचार्य थे | भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इनका उल्लेख किया है | थीवो महामहोपाध्याय पंडित सुधकर दिवेदी के अनन्य मित्र थे और दोनों मिल कर ज्योतिष ग्रंथो का संपादन करते थे | इन लोगो ने ब्रम्हासुत्र और श्रीभास्य का अंग्रेजी-अनुवाद किया जो मैक्स मूलर के “दी सेक्रेटे बुक्स ऑफ़ ईस्ट “ में प्रकाशित हुआ | थीवो डॉ गंगानाथ झा के भी मित्र थे और उन्होने ‘ इंडियन ठाट ‘ नामक पत्रिका प्रकाशित की | थीवो ने तात्या शास्त्री और गंगाधर शास्त्री को नियुक्त किया | इसी प्रकार पंचांग के लिये विख्यात महामहोपाध्याय बापुदेव शास्त्री गणित के प्राचार्य नियुक्त हुए | थीवो के समय में ही प्रथमा आदि परीक्षाये प्रारंभ हुई |

थीवो के यशश्वी उतराधिकारी थे डॉo अर्थेर वेनिश, जिन्होने १८८८ ईo से १९१८ ईo तक क्वीन्स कॉलेज की प्रिंसिपली की | अंग्रेज़ होते हुए भी वेनिश काशी के वरदपुत्र थे | इनके पिता डॉo ईo लेo लॉजरस काशी में ही रहते थे ( नदेसर में अभी तक लॉजरस कोठी थी |) | वेनिश जीवन भर काशी में ही रहे | केवल अध्यन के लिए कुछ वर्ष ऑक्सफ़ोर्ड गये थे | वेनिश साहब के गुरुओ में महामुखोपाध्याय कैलाश चंद सिरोमणि और महामहोपाध्याय गंगाधर शास्त्री प्रभृति विद्वान थे | डॉo वेनिश वेदांत और न्याय शास्त्र के विद्वान थे | महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज जी को ये अपना मानस पुत्र मानते थे | वेनिश साहब के प्रयास से ही पुस्तकालय ‘ सरस्वती भवन ‘ बना | वेनिश साहब के प्रयास से ही सन १८९३ ईo में बनारस संस्कृत सीरीज और चोव्खाम्भा संस्कृत सीरीज का प्रकाशन आरम्भ हुआ | काशी के सम्पन रईसों से वेनिश साहब की मैत्री थी | उनके प्रयास से मुंशी साधोलाल ने रिसर्च स्कोलेरशिप की स्थापना की | सरस्वती भवन तेक्स्तस तथा सरस्वती भवन स्टडीज के प्रकाशन का सुभारम्भ हुआ और १८९० ईo में विजयनगरम संस्कृत सीरीज का प्रकाशन आरम्भ हुआ | डॉo वेनिश के मानस पुत्र स्वनाम धन्य जीवंत विश्वनाथ महामहोपाध्याय डॉo गोपीनाथ कविराज जी थे जिन्हे वेनिश जयपुर से काशी लाये,क्वीन्स कॉलेज से एमo एo कराया और यही पुस्तकालयअध्यक्ष और प्रिंसिपल बनाया | वेनिश के बाद पीo एसo बरेल और जेनिग्स आये | इस बीच १९१८ ईo में हाट्रोग कमिसन आया जिसने फतवा दिया की क्वीन्स कॉलेज इस योग्य नहीं की इसमें एमo एo , बीo एo की शिक्षा हो सके,अतः उनकी सिफारिस पर डिग्री और पोस्ट ग्रेजुएट कक्षाए बंद कर दी गयी और संस्कृत तथा अंग्रजी कॉलेज बंद करदिये गये ( यधपि सम्बन्ध बना रहा | ) | मुख्या गाथिक भवन में संस्कृत कॉलेज के आलावा विश्वविद्यालय की स्थापना होने तक इन्टर की कक्षाए चलती रही | इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल का कार्यकाल भी वही था | स्कूल की कक्षाए सड़क पार भवन में जहाँ इस समय पुरातत्व विभाग है , चलती थीं | विज्ञान की पढाई चौमुहानी पर स्थित भवन में चलती थी | छात्रावास भी यही था |

किंवा कॉलेज अब क्वीन्स इंटरमीदिएत कॉलेज हो गया जिसके प्रिंसिपल बने डॉo बीo संजीवा राव | संस्कृत विद्यालय – गवर्मेंट कॉलेज बन गया | इसके प्रधानाचार्य बने डॉo सर गंगानाथ झा | इस कॉलेज की बड़ी प्रसिधी थी, स्वतन्त्रा – पूर्व युग में अपरोक्ष रूप से यह एक विश्वविद्यालय ही था | भारत और नेपाल के सैकड़ो संस्कृत विश्वविद्यालय इससे संबध थे और यहाँ अखिल भारतीय परीक्षा होती थी और उपलब्धिया प्रदान की जाती थी |

डॉo गंगानाथ झा ने १८८६ ईo में क्वीन्स कॉलेज से ही डॉo थीबो के जमाने में शिक्षा प्राप्त की थी और १८९० ईo में ही यही से एमo एo हुए थे | ज्ञातब्य है की भारतरत्न डॉo भगवान दास के बड़े भाई श्री गोविन्द दास जी इनके सहपाठी थे | डॉo झा के बाद यह पद गौरवान्वित किया डॉo गोपिराज कविराज ने १९२३ ईo से १९३७ ईo तक | उसके बाद डॉo मंगलदेव शास्त्री सन १९५६ तक प्रिंसिपल रहे जबकि डॉo संपूर्णानंद ने इसे वाराणसेय संस्कृत विश्वविध्यालय बना दिया | उन्होने गोपिराज कविराज जी से प्रथम कुलपति होने का आग्रह किया जिसे वीतराग विद्वान ने अस्वीकार कर दिया | तब आदित्यनाथ झा कुलपति बने और तब से विश्वविद्यालय प्रगति कर रहा है | इधर क्वीन्स कॉलेज में संजीवा राव के बाद क्रमशः प्रोo अली अमीर, आरo एनo कौल, एसo बीo परमानन्द, चन्द्रमोहन चक आदि प्रिंसिपल रहे | अब क्वीन्स कॉलेज जगतगंज चौराहे पर स्थित विज्ञान कॉलेज में स्थानान्तरित हो गया है | उसके नए भवन बन गये है और आज का प्रसिद्ध सरकारी इंटर कॉलेज है | ( और आज भी उसे अपने गाथिक भवन की बुक-बेल एंड द कैंडिल समाधि की याद सताती है पर ‘गैस ‘ की मीठी गंध उसे अतीत भुलाकर वर्तमान में कर्तव्य रहने का निर्देश करती है |)